पितृ पक्ष विशेष:

श्राद्ध का अर्थ है, श्रद्धा, आस्था व प्रेम के साथ कुछ भी भेंट किया जाय। पितृ पक्ष पूर्वजों की मृत्यु तिथि के दिन जल, जौ, कुशा, अक्षत, दूध, पुष्प आदि से उनका श्राद्ध सम्पन्न किया जाता है। पितृ पक्ष में श्राद्ध करने से पितृ दोष से मुक्ति मिलती है तथा पूर्वज प्रसन्न होकर पूरे वर्ष आपके दीघार्यु तथा प्रगति की कामना करते है। एक मास में दो पक्ष होते है। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष, एक पक्ष 15 दिन का होता है। आश्विन मास के कृष्ण पक्ष के पन्द्रह दिन पितृ पक्ष के नाम से प्रचलित है। इन 15 दिनों में लोग अपने पूर्वजों/पितरों को जल देंते है तथा उनकी मृत्यु तिथि पर श्राद्ध करते है। पितरों का ऋण श्राद्धों के द्वारा उतारा जाता है। पितृ पक्ष श्राद्धों के लिए निश्चित पन्द्रह तिथियों का कार्यकाल है। वर्ष के किसी महीना या तिथि में स्वर्गवासी हुए पूर्वजों के लिए कृष्ण पक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है। विशेष मुहूर्त- शास्त्रों के अनुसार गृहस्थ को अपने पूर्वजों की निधन तिथि के दिन तृतीय प्रहर (अपरान्हकाल) में श्राद्ध करना चाहिए। इसलिए पितृकर्म में अपरान्हव्यापनी तिथि ग्रहण करनी चाहिए। इस वर्ष पितृ पक्ष 14 सितम्बर से प्रारम्भ होकर 28 सितम्बर तक रहेंगे। तर्पण-प्रत्येक दिन मध्यान्ह 12 बजे से 1:30 मि0 के मध्य तर्पण करना उत्तम रहेगा। निर्णय सिन्धु में- 12 प्रकार के श्राद्धों का उल्लेख मिलता है। 1- नित्य श्राद्ध: कोई भी व्यक्ति अन्न, जल, दूध, कुशा, पुष्प व फल से प्रतिदिन श्राद्ध करके अपने पितरों को प्रसन्न कर सकता है। 2- नैमित्तक श्राद्ध- यह श्राद्ध विशेष अवसर पर किया जाता है। जैसे- पिता आदि की मृत्यु तिथि के दिन इसे एकोदिष्ट कहा जाता है। इसमें विश्वदेवा की पूजा नहीं की जाती है, केवल मात्र एक पिण्डदान दिया जाता है। 3- काम्य श्राद्ध: किसी कामना विशेष के लिए यह श्राद्ध किया जाता है। जैसे- पुत्र की प्राप्ति आदि। 4- वृद्धि श्राद्ध: यह श्राद्ध सौभाग्य वृद्धि के लिए किया जाता है। 5- सपिंडन श्राद्ध- मृत व्यक्ति के 12 वें दिन पितरों से मिलने के लिए किया जाता है। इसे स्त्रियां भी कर सकती है। 6- पार्वण श्राद्ध: पिता, दादा, परदादा, सपत्नीक और दादी, परदादी, व सपत्नीक के निमित्त किया जाता है। इसमें दो विश्वदेवा की पूजा होती है। 7- गोष्ठी श्राद्ध: यह परिवार के सभी लोगों के एकत्र होने के समय किया जाता है। 8- कमार्गं श्राद्ध: यह श्राद्ध किसी संस्कार के अवसर पर किया जाता है। 9- शुद्धयर्थ श्राद्ध: यह श्राद्ध परिवार की शुद्धता के लिए किया जाता है। 10- तीर्थ श्राद्ध: यह श्राद्ध तीर्थ में जाने पर किया जाता है। 11- यात्रार्थ श्राद्ध: यह श्राद्ध यात्रा की सफलता के लिए किया जाता है। 12- पुष्टयर्थ श्राद्ध: शरीर के स्वास्थ्य व सुख समृद्धि के लिए त्रयोदशी तिथि, मघा नक्षत्र, वर्षा ऋतु व आश्विन मास का कृष्ण पक्ष इस श्राद्ध के लिए उत्तम माना जाता है। पितृ पक्ष के विशेष दिन- 1- प्रतिपदा तिथि को नाना का श्राद्ध किया जाता है। 2- चतुर्थी या पंचमी तिथि में उसका श्राद्ध किया जाता है जिसकी मृत्यु गतवर्ष हुयी है। 3- अपने जीवन काल में मरने वाली स्त्री का श्राद्ध नवमी तिथि को किया जाता है। 4- युद्ध, दुर्घटना या आत्महत्या आदि में मृत व्यक्तियों का श्राद्ध चतुर्दशी तिथि में किया जाता है। 5- आमावस्या तिथि को सभी पितरों का श्राद्ध किया जा सकता है।

१३ सितम्बर (शुक्रवार) पूर्णिमा श्राद्ध
१४ सितम्बर (शनिवार) प्रतिपदा श्राद्ध
१५ सितम्बर (रविवार) द्वितीया श्राद्ध
१७ सितम्बर (मंगलवार) तृतीया श्राद्ध
१८ सितम्बर (बुधवार) महा भरणी, चतुर्थी श्राद्ध
१९ सितम्बर (बृहस्पतिवार) पञ्चमी श्राद्ध
२० सितम्बर (शुक्रवार) षष्ठी श्राद्ध
२१ सितम्बर (शनिवार) सप्तमी श्राद्ध
२२ सितम्बर (रविवार) अष्टमी श्राद्ध
२३ सितम्बर (सोमवार) नवमी श्राद्ध
२४ सितम्बर (मंगलवार) दशमी श्राद्ध
२५ सितम्बर (बुधवार) एकादशी श्राद्ध, द्वादशी श्राद्ध
२६ सितम्बर (बृहस्पतिवार) मघा श्राद्ध, त्रयोदशी श्राद्ध
२७ सितम्बर (शुक्रवार) चतुर्दशी श्राद्ध
२८ सितम्बर (शनिवार) सर्वपित्रू अमावस्या

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